भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की ताज़ा रिपोर्ट ‘लैंडस्लाइड एटलस ऑफ इंडिया’ ने एक बार फिर उत्तराखंड की धरती के अस्थिर भविष्य की ओर इशारा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, रुद्रप्रयाग जिला देश का सबसे अधिक भूस्खलन और भू-धंसाव प्रभावित क्षेत्र बन गया है। लगातार दूसरे वर्ष भी रुद्रप्रयाग इस सूची में पहले स्थान पर बना हुआ है। इसके बाद टिहरी गढ़वाल को दूसरा और केरल के त्रिशूर जिले को तीसरा स्थान मिला है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की ताज़ा रिपोर्ट ‘लैंडस्लाइड एटलस ऑफ इंडिया’ ने एक बार फिर उत्तराखंड को लेकर खतरे की घंटी बजा दी है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि रुद्रप्रयाग ‘अत्यंत संवेदनशील’ क्षेत्र है, जहां भूगर्भीय हलचलों में निरंतर वृद्धि हो रही है। विशेष रूप से केदारनाथ हाईवे, जो चारधाम यात्रा का मुख्य मार्ग है, 51 सक्रिय डेंजर ज़ोन से प्रभावित है। इनमें से कई जगहों पर अस्थायी मरम्मत कार्य तो हो रहे हैं, लेकिन जवाड़ी क्षेत्र में तीन स्थलों पर गहरा भू-धंसाव चिन्हित किया गया है। इस वर्ष 13 नए भू-धंसाव क्षेत्र उभरकर सामने आए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि खतरा सिर्फ जारी ही नहीं है, बल्कि तेज़ी से बढ़ रहा है।
क्या कहती है भूगर्भीय पड़ताल?
गढ़वाल विश्वविद्यालय के वरिष्ठ भूवैज्ञानिक डॉ. एस. पी. सती के अनुसार, हिमालय क्षेत्र में अब लंबी भौगोलिक दरारें (geological fractures) विकसित हो चुकी हैं, जो भविष्य में बड़े भूवैज्ञानिक परिवर्तनों का संकेत दे रही हैं। उन्होंने बताया कि मंदाकिनी घाटी में तिब्बत की दिशा से बढ़ते टेक्टॉनिक दबाव के कारण भू-संरचना पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। डॉ. सती का कहना है कि क्षेत्र में सड़कों, सुरंगों और जलविद्युत परियोजनाओं जैसे बड़े निर्माण कार्यों ने इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं को और अधिक अस्थिर और तीव्र बना दिया है। यदि निकट भविष्य में वैज्ञानिक निगरानी, नियंत्रित विकास नीति और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को सख्ती से लागू नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह इलाका विनाशकारी आपदाओं का केंद्र बन सकता है।
केदारनाथ हाईवे पर संकट
केदारनाथ धाम की यात्रा पर हर वर्ष लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं, जिससे यह मार्ग धार्मिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। हालांकि, हालिया रिपोर्ट में केदारनाथ हाईवे को देश के सबसे असुरक्षित और संवेदनशील मार्गों में से एक बताया गया है। इस मार्ग के कई हिस्सों में सतही दरारें, अस्थिर चट्टानें, और लगातार मिट्टी धंसने की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जो यात्रियों और स्थानीय निवासियों दोनों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रही हैं।
राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण विभाग (PWD) के अधिशासी अभियंता ओंकार पांडेय ने स्वीकार किया कि विशेषज्ञों की चेतावनियों को ध्यान में रखते हुए वर्तमान में तात्कालिक मरम्मत और स्थिरीकरण कार्य किए जा रहे हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि समस्या की जड़ें गहरी हैं, और इसके लिए दीर्घकालिक भू-वैज्ञानिक अध्ययन व स्थायी निवारक योजना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि भविष्य में सड़क की मजबूती और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इंजीनियरिंग समाधान, जैसे रिटेनिंग वॉल्स, ड्रेनेज सुधार और ढलानों की प्राकृतिक स्थिरीकरण प्रणाली अपनाई जाएगी
आपदा का ताजा चेहरा
राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि इस वर्ष के मानसून में भारी बारिश, भूस्खलन और फ्लैश फ्लड ने राज्य में भारी तबाही मचाई है। अब तक 135 लोगों की मृत्यु, 148 घायल, और 90 लोग लापता हैं। पशुधन और निजी संपत्ति को भारी क्षति हुई है, साथ ही सड़कें, बिजली, जल आपूर्ति, कृषि भूमि, घर और व्यवसायिक प्रतिष्ठान सब कुछ प्रभावित हुआ है।
क्या है ज़रूरत?
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों ने सुझाव दिया है कि अब पर्वतीय इलाकों में सख्त निर्माण मानक लागू करना अत्यंत आवश्यक हो गया है। उनका मानना है कि विकास कार्यों को भूगर्भीय स्थिरता और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर ही अनुमति दी जानी चाहिए। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि राज्य में स्थायी भूगर्भीय अध्ययन, भूस्खलन मॉनिटरिंग सिस्टम, और प्रारंभिक चेतावनी तंत्र (Early Warning Systems) को मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि आपदाओं के जोखिम को समय रहते कम किया जा सके। साथ ही, स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण देकर उन्हें आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। अधिकारियों का कहना है कि पर्यटन और धार्मिक यात्राओं को भी पर्यावरणीय वहन क्षमता (carrying capacity) के अनुसार संतुलित किया जाना चाहिए, ताकि प्रकृति पर दबाव कम हो और विकास के साथ-साथ पारिस्थितिक संतुलन भी बना रहे।
चेतावनी से कार्यवाही की ओर
ISRO की यह रिपोर्ट कोई पहली चेतावनी नहीं है। लेकिन इसे नजरअंदाज करना भविष्य में केवल और अधिक तबाही को न्योता देना होगा। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग और टिहरी जैसे जिलों को “आपदा संभावित ज़ोन” घोषित कर, उन पर विशेष निगरानी और सुरक्षा कार्यों की तत्काल आवश्यकता है। यह समय है कि हम प्रकृति की चेतावनी को गंभीरता से लें, वरना आने वाली पीढ़ियों को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।