“25 वर्षों का सफर: कितना पूरा हुआ उत्तराखंड का विकास वादा?”

उत्तराखंड अपनी 25वीं वर्षगांठ मना रहा है। दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राज्य अब भी बेरोज़गारी, पेपर लीक और पलायन जैसी पुरानी चुनौतियों से जूझ रहा है। जहाँ एक ओर विकास की चमक और आधुनिकता की तस्वीरें दिखती हैं, वहीं दूसरी ओर पहाड़ों की असल ज़िंदगी अब भी संघर्ष और उम्मीदों के अंधेरे में डूबी है। विकास के वादों और ज़मीनी हकीकत के बीच का यह अंतर आज भी सवाल खड़े करता है — क्या सच में उत्तराखंड वह बन पाया है, जिसका सपना लोगों ने 2000 में देखा था?

उत्तराखंड का जन्म 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर हुआ था। इस तारीख़ के पीछे सिर्फ एक सरकारी आदेश नहीं, बल्कि हजारों लोगों का संघर्ष, आंदोलन और बलिदान छिपा था। 1990 के दशक में पहाड़ों के लोगों ने महसूस किया कि उनकी समस्याएँ मैदानों से अलग हैं, और देखते-देखते इन समस्याओ ने आंदोलन का रुप ले लिया। छात्र, महिलाएँ, बुज़ुर्ग, किसान, सब सड़कों पर उतरे।हर गाँव, हर चौक पर आवाज़ उठी, “अपना राज्य, अपने सपने, और रोजगार की।”

लेकिन 2 अक्टूबर 1994 के रामपुर तिराहा कांड ने पूरे पहाड़ को झकझोर दिया। किसी ने अपने खोये, तो किसी ने सपने, पर उम्मीद नहीं छोड़ी।और आखिरकार, 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य का सपना सच हुआ। आज, जब राज्य अपनी रजत जयंती यानी 25वीं वर्षगांठ मना रहा है, तो दिल में जश्न से ज़्यादा सवाल हैं, क्या वो सपने सच हुए, जिनके लिए लोगों ने आंदोलन किया था?

हाँ, शहरों में विकास की चमक आई है-सड़कें बनीं, पुल खड़े हुए, और योजनाएँ आईं। लेकिन पहाड़ का असली चेहरा आज भी वैसा ही है, बेरोज़गारी, पलायन और टूटी उम्मीदों से भरा हुआ।
राज्य बनने के बाद युवाओं ने सोचा था, अब अपने ही राज्य में नौकरी के लिए अवसर मिलेंगे, परंतु सरकारी भर्तियों का हाल सबके सामने है, या तो सालों तक परीक्षाएँ नहीं होतीं, और जब होती हैं, तो पेपर लीक की खबरें सामने आ जाती हैं। मेहनत करने वाला युवा सिस्टम से हारता हुआ नजर आ रहा हैं।

विकास के नाम पर जो हो रहा है, उसने पहाड़ों की रूह को घायल कर दिया है। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाएँ तेज़ी का प्रतीक ज़रूर हैं, लेकिन इनकी कीमत पर जंगलों का अस्तित्व मिटा दिया गया।
हजारों पेड़ काटे गए, पहाड़ों का पेट चीर दिया गया, और अब वही इलाके हर बरसात में भूस्खलन का शिकार बन रहे हैं।जहाँ कभी हवा में देवदार की खुशबू थी, अब वहाँ धूल और मशीनों की गड़गड़ाहट है।

राजधानी देहरादून और कुछ शहर जरूर चमके हैं, पर पहाड़ों के गाँव आज भी खाली हो रहे हैं। बुजुर्ग अकेले हैं, खेत बंजर हैं, और नौजवान मैदानों में रोज़गार ढूँढने को मजबूर हैं। शिक्षा का हाल भी चिंता का विषय है-स्कूल हैं, पर शिक्षक नहीं। कॉलेज हैं, पर दिशा नहीं।

25 बरसों का ये सफर बहुत कुछ सिखा गया- विकास सिर्फ सड़कों और इमारतों का नहीं होता,विकास तब होता है जब कोई युवा बेरोज़गार न रहे, जब कोई माँ अपने बेटे को पलायन के लिए रवाना न करे।अब वक्त है कि उत्तराखंड फिर से अपने लोगों का राज्य बने,वरना ये पहाड़ एक दिन सिर्फ यादों में रह जाएंगे।

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