उत्तराखण्ड की सीमाएं न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत उदाहरण हैं, बल्कि यहाँ की सांस्कृतिक विविधता भी राज्य की पहचान को विशिष्ट बनाती है। ऊँचे हिमालयी दर्रे, बर्फ से ढकी चोटियाँ और अनछुए रास्ते इस धरती की अनकही कहानियाँ समेटे हुए हैं। इन दुर्गम सीमांत क्षेत्रों में साहसिक पर्यटन की अपार संभावनाएँ विद्यमान हैं, लेकिन लंबे समय तक ये क्षेत्र मानवीय गतिविधियों से लगभग अछूते रहे। न तो इन्हें पर्याप्त पहचान मिल सकी और न ही योजनाबद्ध रूप से इन्हें राज्य के पर्यटन मानचित्र पर वह स्थान मिला, जिसके ये वास्तव में हकदार हैं।
ऐसे में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के एक समर्पित और प्रेरणास्पद अधिकारी डॉ. दीपक सैनी ने ‘प्रोजेक्ट 21’ की शुरुआत कर एक ऐसा इतिहास रचने का बीड़ा उठाया है, जो न केवल रोमांच प्रेमियों के लिए एक नया अध्याय खोलेगा, बल्कि सीमावर्ती गांवों के लिए आजीविका के स्थायी अवसर भी सृजित करेगा।
प्रोजेक्ट 21: क्या है यह अभियान?
‘प्रोजेक्ट 21’ का उद्देश्य उत्तराखण्ड के इंडो-तिब्बत सीमा पर स्थित 21 उच्च हिमालयी दर्रों (पासेस) पर चढ़ाई करना है, जिनकी ऊंचाई लगभग 5000 से 6000 मीटर के बीच है। ये दर्रे अत्यंत दुर्गम, रणनीतिक और साहसिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

इस अभियान के तीन चरण हैं
प्रथम चरण: चमोली जनपद के 10 दर्रों पर चढ़ाई (सफलतापूर्वक पूर्ण)
डॉ. सैनी ने अभियान की शुरुआत चमोली जिले से की, जहां उन्होंने 10 प्रमुख दर्रों को पार किया। इनमें शामिल हैं, माना दर्रा (5600 मीटर), लेपचा दर्रा (5800 मीटर), नीती दर्रा (5100 मीटर), तुन जुं ला दर्रा (5000 मीटर), मर्ही ला दर्रा (5300 मीटर), शाल शाल ला दर्रा (5350 मीटर), बल्चा धूरा (5350 मीटर), घाटमिल धूरा (5400 मीटर), कियो धूरा (5500 मीटर) और किंगरी बिंगरी ला (5540 मीटर)।
द्वितीय चरण: पिथौरागढ़ जनपद के 11 दर्रों की चुनौती (प्रारंभिक अवस्था में)
इस चरण की शुरुआत हाल ही में जिलाधिकारी पिथौरागढ़, आईटीबीपी 14वीं वाहिनी के कमांडेंट और भारतीय सेना के अधिकारियों द्वारा की गई। इसमें निम्नलिखित 11 दर्रों पर चढ़ाई की योजना है। जिसमें उंटा धूरा दर्रा (5350 मीटर), ज्यांति धूरा दर्रा (5600 मीटर), किंगरी बिंगरी ला (5540 मीटर), नूवे धूरा दर्रा (5634 मीटर), लोवे रा दर्रा (5562 मीटर), सिन् ला दर्रा (5300 मीटर), लम्पिया धूरा दर्रा (5532 मीटर), मंगशा धूरा दर्रा (5637 मीटर), लिपुलेख दर्रा (5100 मीटर), भारत-नेपाल-चीन त्रिजंक्शन दर्रा (5400 मीटर) और (पुनः) किंगरी बिंगरी ला – इस दर्रे को दोनों चरणों में कवर किया गया है।

तृतीय चरण: उत्तरकाशी जनपद के 4 सीमाई दर्रों की योजना
अभियान का अंतिम चरण उत्तरकाशी जिले में होगा, जहां चार अत्यंत संवेदनशील एवं रणनीतिक दर्रों पर आरोहण किया जाएगा। जिसमें थाग ला – 1, थाग ला – 2, त्सांग चोक ला और मूलिंग ला।
अभियान की विशेषताएं और राष्ट्रीय महत्त्व : डॉ. सैनी यदि इन सभी 21 दर्रों पर सफलतापूर्वक आरोहण करते हैं, तो वे ऐसे पहले व्यक्ति बन जाएंगे, जिन्होंने नागरिक या सशस्त्र बल सदस्य के रूप में यह उपलब्धि हासिल करेंगे।
सेना और ITBP का सहयोग : इस अभियान में भारतीय सेना और इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (ITBP) का सक्रिय सहयोग प्राप्त है। इससे अभियान की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता और अधिक बढ़ जाती है।
पर्यटन और आजीविका को बढ़ावा : इस प्रयास से सीमावर्ती गांवों में सतत (सस्टेनेबल) पर्यटन, होमस्टे संस्कृति, स्थानीय गाइडिंग और हस्तशिल्प उत्पादों के माध्यम से रोजगार की संभावनाएं विकसित होंगी।
राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण : इन दर्रों की पहचान और उनमें नियमित गतिविधि सीमाओं पर सामरिक उपस्थिति और जन-सहभागिता को भी सशक्त करती है।
भविष्य की दिशा – एक राष्ट्रीय मॉडल : ‘प्रोजेक्ट 21’ केवल एक व्यक्तिगत या प्रशासनिक प्रयास नहीं है, बल्कि यह एक नीति-सूचक मॉडल है जो हिमालयी राज्यों के लिए साहसिक पर्यटन, सीमा प्रबंधन और ग्रामीण विकास को समाहित करने वाली एकीकृत रणनीति का मार्ग प्रशस्त करता है।

एक प्रेरणादायक प्रयास
डॉ. दीपक सैनी का यह अभियान न केवल उनकी साहसिक भावना और जन सेवा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, बल्कि यह उत्तराखण्ड के भविष्य को सतत, समावेशी और साहसी विकास की ओर ले जाने वाला मील का पत्थर भी है।
इस अभियान से जुड़े हर व्यक्ति, विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों के निवासियों को एक नई आशा, नई ऊर्जा और नई पहचान मिल रही है।